Founder - Pt. Satyendra Mishra

Founder, Ganga Seva Nidhi


अध्यक्ष जी की कलम से

सर्वप्रथम मैं संत सिरोमणि परमहंस देव श्री श्री बापू जी महराज के चरणों में कोटि-कोटि नमन करता हूँ, जिनके स्मित प्रकाश की प्रेरणा से आज से दस वर्ष पूर्व गंगाजल निर्मलीकरण, विश्व प्रसिद्ध गंगा घाटों के सौन्दर्गीकरण एवं काशी के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप की रक्षा और उन्नयन का दृढ़ एवं विशुद्ध संकल्प लिया गया। अनादि काल से भारतवर्ष मानवता का संस्कृति, धर्म एवं आध्यात्म के शाश्वत मूल्यों का सनातन देश रहा है। राम कृष्ण की अवतार भूमि, ऋषियों-मनीषियों का तपोवन, बुद्ध, महावीर, गुरुनानक और रविदास की साधना भूमि ने सदा से ही विश्व को शान्ति, समृद्धि और अमरत्व का संदेश दिया है। ज्ञान की साधना, कर्म की निरन्तरता, त्याग एवं समर्पण की भक्ति से अमरता में स्थित रहने का विज्ञान ही इसकी अक्षयनिधि है। भारत की इसी पवित्र धरती पर ज्ञान-विज्ञान की विश्व प्रसिद्ध राजधानी के रूप में विख्यात काशी का अस्तित्व वैदिक युग के पूर्व से ही रहा है। काशी को पुराणों में अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है।


भगवान विश्वनाथ की नगरी काशी ज्ञान की पुरी है और गंगा ब्रहमद्रवी है। यही काशी के आध्यात्म सूत्र है, सहस्त्राब्दियों से ज्ञान की अनन्त धारा के रूप में काशी में गंगा निरन्तर प्रवाहमान है।

हमारे ऋषियों और मनीषियों ने जहाँ गंगा के पतितपावनी स्वरूप का वर्णन कर गंगा को मानव जीवन के आध्यात्मिक पक्ष से जोड़ा है वही आम आदमी के लिए गंगाजल जीवन है, क्योंकि जल के अभाव में तो मनुष्य के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज हमें शुद्ध जल भी उपलब्ध नहीं है। आधुनिक एक पक्षीय भौतिकतावादी अनियोजित विकास ने हमें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदना शुन्य बना दिया है परिणाम स्वरूप हमने अपने जीवनदायी स्त्रोतों को अपने स्वार्थ की चपेट में लेकर स्वयं ही अपने भावी विनाश को आमंत्रण दे दिया है। प्रकृति हमारी माँ है, क्योंकि माँ वह है जो जीवन देती है जीवन की रक्षा करती है और जीवन संवारती भी है। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए हमने निरन्तर प्रकृति (माँ) पर हमला किया है उसे प्रदूषित किया है। गंगा जल का प्रदूषण भी इसी की एक कड़ी है।

इन्हीं विषम परिस्थितियों में आज से एक दशक पूर्व (१९९२) कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा सेवा निधि ने स्वच्छ काशी, स्वच्छ गंगा, स्वच्छ घाट व पर्यावरण संरक्षण के लिए जनचेतना जागृत करने के उद्देश्य से एक जनानदोलन प्रारम्भ किया था। तब से लेकर आज तक गंगा सेवा निधि के अन्तर्गत हमने अपने सीमित संसाधनों में विभित्र कार्यक्रमों चित्रप्रदर्शनी, विचारगोष्ठी, व्याख्यामाला, भक्तिकथाओं का संयोजन, गंगा की आरती, दीपदान, देवदीपोत्सव गंगा दशहरा महोत्सव, स्वच्छ काशी, स्वच्छ गंगा संकल्प अभियान, घाटों की स्वच्छता हेतु नित्य श्रमदान इत्यादि के माध्यम से जन-जागरण का प्रयास किया है। इसके अतिरिक्त यह संस्था भारतीय धर्म, दर्शनं एवं संस्कृति, के प्रचार-प्रसार के उन्नयन एवं मूल्यपरक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा भारतीय संगीत के संवर्द्धन के लिये भी निरन्तर प्रयत्नशील है।

भगवान विश्वनाथ और भगवती गंगा से यही प्रार्थना है कि वे हमें ऐसी शक्ति प्रदान करें जिससे कि श्ज्योतिर्गमयश् के उद्देश्य से युक्त इस आलोग पर्व पर अन्तस के अन्धकार को दूर कर हम प्रकाश पथ के गामी बनें।

(सत्येन्द्र मिश्र)
संस्थापक अध्यक्ष